हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में मनाया गया भारत की साझी संस्कृति का प्रतीक पर्व बसंत

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में मनाया गया भारत की साझी संस्कृति का प्रतीक पर्व बसंत

Hazrat Nizamuddin Auliya

Hazrat Nizamuddin Auliya

अनिल गुप्ता अर्थ प्रकाश दिल्ली 

नई दिल्ली। Hazrat Nizamuddin Auliya: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ऐतिहासिक दरगाह परिसर में बसंत का पर्व आध्यात्मिक भावना और साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ मनाया गया। पीले रंग की छटा, सूफ़ियाना संगीत और श्रद्धा से सराबोर इस आयोजन में धर्म, क्षेत्र और सामाजिक पृष्ठभूमि से परे सैकड़ों श्रद्धालु एकत्र हुए और प्रेम, आस्था व एकता के साथ वसंत के आगमन का स्वागत किया।

नवजीवन और आशा के प्रतीक पीले परिधानों में सजे श्रद्धालुओं ने दरगाह पर सरसों के फूल चढ़ाए, जो पीढ़ियों से चली आ रही उस परंपरा को दोहराता है, जिसने समय के साथ अपनी जीवंतता बनाए रखी है। परिसर में गूंजती रूहानी क़व्वालियों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। प्रख्यात क़व्वाल चाँद निज़ामी और हमसर हयात ने दरगाह परिसर के विभिन्न स्थलों पर अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, जहाँ कविता, रहस्यवाद और संगीत एक साझा आध्यात्मिक अनुभव में पिरोए गए।

आयोजन की व्यवस्था संभाल रहे दरगाह इंचार्ज सैयद काशिफ़ निज़ामी ने कहा कि निज़ामुद्दीन में बसंत केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संदेश है। यह विविधता में एकता का प्रतीक है, जहाँ आस्था सीमाओं से ऊपर उठकर प्रेम, शांति और आपसी सम्मान के साथ लोगों को जोड़ती है।
सैयद बिलाल निज़ामी ने कहा कि पिछले 750 वर्षों से बसंत उत्सव हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में मनाया जा रहा है और हमेशा से बिना धार्मिक भेदभाव के लोग यहाँ अपनी हाजरी लगाते हैं।
इस अवसर पर सभी धर्म संप्रदाय के जिम्मेदार लोग भी यहाँ देखने को मिले जिसमें फेस ग्रुप के चेयरमैन डॉ० मुश्ताक़ अंसारी, सोनम बेकर्स के सी एम डी हाजी रियाज़ुद्दीन अंसारी, जर्नलिस्ट हाफ़िज़ गुफ़रान अफ़रीदी, सैफ़ुद्दीन शेख़, मुस्तफ़ा गुड्डू आदि के नाम मुख्य रूप से शामिल हैं। 

विभाजन और असहिष्णुता के इस दौर में निज़ामुद्दीन में मनाया गया बसंत भारत की मिश्रित संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की उज्ज्वल याद दिलाता हुआ एक सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया।